Tuesday, 21 July 2026

छोटी चूत के मज़े

कहते हैं किसी लड़की को गैर मर्द के साथ अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि मर्द उसे पकड़कर छोड़ने की ही सोचेगा। कैसे इसके बुर में अपना लंड डाल दूं – यही ख्याल उसके मन में कुलबुलाएगा। दोस्तों मेरे साथ ऐसा ही हुआ। एक दिन मैं अपने घर में अकेला था। बीवी मायके गई थी और बच्चे स्कूल गए थे। मैंने घर में कुछ ज़रूरी काम करने के लिए ऑफिस से छुट्टी ले रखी थी। करीब 11.00 बजे दरवाज़े पर हुआ टिंग टोंग! दरवाज़ा खोला तो सामने मानो एक अप्सरा खड़ी थी। 28-29 साल की गजब की सवाली और सुंदर औरत साड़ी पहने हुए और हाथों में कागज और कलम लिए हुए कोयल की आवाज़ में बोली, ”माफ़ कीजिएगा, क्या बहनजी हैं?” मैंने कहा, “जी नहीं, इस वक़्त तो सिर्फ मैं हूँ। आप कौन हैं?” उसके सर पर पसीने की कुछ बूंदें थीं। वो बोली “ज़रा एक गिलास पानी मिलेगा?” मैंने कहा, “हाँ, क्यों नहीं?” वो ज़रा सा अंदर आई। मैंने पानी का गिलास देते हुए पूछा, “क्या बात है, आप हैं कौन?” पानी पीकर वो बोली, “जी मैं एक सर्वे पर हूँ। क्या आप मेरे कुछ सवालों का जवाब दे देंगे?” मैंने कहा, “जी कोशिश कर सकता हूँ। आप प्लीज़ यहाँ बैठ जाइए।” वो सोफे पर बैठ गई और हमारे घर का दरवाज़ा अभी खुला ही था। मैंने दूसरे सोफे पर बैठ कर कहा, “हाँ, पूछिए।” वो बोली, “जी मुझे एक कंज्यूमर कंपनी ने भेजा है सर्वे के लिए। आप लोग अपने घर की ज़रूरत की चीज़ों को कहाँ से खरीदते हैं?” इस तरह वो सवाल पर सवाल पूछती रही और मैं जवाब देता गया। हमारे कमरे की बड़ी खिड़की से तेज़ हवा आ रही थी और दरवाज़ा काफी हिल रहा था। कुछ देर बाद मैंने पूछा, “इस तरह के मौसम में भी आप क्या सब घरों में जाकर सर्वे करती हैं?” “जी, जॉब तो जॉब ही है ना।” “तो आप शादी शुदा होकर (उसके माथे पर सिंदूर था) भी जॉब कर रही हैं?” अब वो थोड़ी सी खुल सी गई। बोली, “क्यों, शादी शुदा औरत जॉब नहीं कर सकती?” “जी ये बात नहीं, घर घर जाना, जाने किस घर में कैसे लोग मिल जाएं?”

उसने जवाब दिया, “वैसे तो दिन के वक़्त ज़्यादातर हाउसवाइफ़ ही मिलती है। कभी कभी ही कोई मेल मेंबर होता है।” “तो आपको डर नहीं लगता।” जी अभी तक तो नहीं लगा। फिर आप जैसे शरीफ आदमी मिल जाए तो क्या डर?” शरीफ आदमी एक बार तो सुन कर अजीब लगा। इसे क्या मालूम मैं इसे किस नज़र से देख रहा था। साड़ी पर ब्लाउज तनी हुए थे और मेरे लंड को खुजली सी होने लगी। जी चाह रहा था कि काश सिर्फ एक बार चूम सकता और ब्लाउज के नीचे उन चुचियों को दबा सकता। हाथों की उंगलियां लंबी लंबी मुलायम सी। देख देख कर लंड महाराज खरे ही हो गए। मन में ज़ोरों से ख्याल आ रहा था, क्या गजब की अप्सरा है। इसकी तो चूत को हाथ लगाते ही शायद हाथ जल जाएगा। तभी वो बोली, “अच्छा, सबके लिए शुक्रिया। मैं चलती हूँ।” मानो पहाड़ टूट गया मेरे ऊपर। चली जाएगी तो हाथ से निकल ही जाएगी। अरे विजय साहब, हिम्मत करो, आगे बढ़ो, कुछ बोलो ताकि रुक ​​जाए। इसके बुर में अपना लंड नहीं डालना है क्या? बुर में लंड? इस ख्याल ने 

बड़ी हिम्मत दी। “माफ़ कीजिएगा, अगर आप बुरा न मानें तो अपना नाम तो बता दीजिए?” मैंने डरते हुए कहा। कोयल सी आवाज़ में बोली, “इसमें बुरा मानने की क्या बात है। प्रतिमा। प्रतिमा श्रीवास्तव।” “प्रतिमाजी, आप जैसी सुंदर औरत को थोड़ा सावधान रहना चाहिए।” “सुंदर?” मैं थोड़ा सा घबराया, लेकिन फिर हिम्मत कर बोला, “जी, सुंदर तो आप हैं ही। बुरा मत मानिएगा। आप प्लीज़ अब तो चाहिए पी कर ही जाइए।” “चाहिए, लेकिन बनाएगा कौन?” “मैं जो हूँ, कम से कम चाहिए तो बना ही सकता हूँ।” वो हँसते हुए बोली, “ठीक है, बनाइए।” मैंने हवा में हिलते दरवाज़े को हल्के-हल्के बंद कर दिया। और उसका ध्यान हटाने के लिए कहा, “आप प्लीज़ वहाँ सोफे पर बैठ जाइए। टीवी ऑन कर लीजिए।” किचन में जाकर मैंने चाय के लिए बर्तन गैस पर रखा और पानी डाला, गैस ऑन किया, फ्रिज से दूध निकाला और दूध थोड़ा सा पानी में मिलाया। मैं चाय के उबलने का इंतज़ार कर रहा था। इधर मेरा लंड उबल रहा था। इतनी सुंदर औरत पास बैठी थी और मुझे पता नहीं था कि कैसे आगे बढ़ूं। तभी वो पीछे से आई और बोली, “क्या मैं आपकी कुछ मदद करूँ?” मैंने जवाब दिया, “बस देख लीजिए, कि चाय ठीक बन रही है या नहीं।” मैंने अब और हिम्मत करके कहा, “प्रतिमाजी, आप भाषण में बहुत सुंदर हैं। और बहुत अच्छी भी। आपके पति बहुत ही खुशनसीब इंसान हैं।” “आप प्लीज बार बार ऐसे ना कहिए। और मुझे प्रतिमाजी क्यों कह रहे हैं। मैं तो आपसे छोटी हूँ।” दोस्तों यह हिंट काफी था मेरे लिए। क्योंकि अगर औरत नहीं चाहे तो उसे छोड़ना बड़ा मुश्किल है। आखिर हमें रेप तो करना नहीं है। मैं समझ गया, यह अब चुदवाने के लिए तैयार है। “ठीक है, प्रतिमाजी नहीं। प्रतिमा। तुम कितनी सुंदर हो, मैं बताऊँ?” “कहाँ तो है आपने कई बार। अब भी बताना बाकी है?” “बाकी तो है।” यह कह कर मैंने गैस बंद किया। “बस एक बार अपनी आँखें बंद करो.. प्लीज़।” उसने आँखें बंद की। मैंने कहा, “आँखें बंद ही रखना।” और मैंने उसको कोहनी के पास से पकड़कर आहिस्ता-आहिस्ता कमरे में लाया। हल्के से मैंने उसके गुलाबी गुलाबी नरम नरम होठों पर अपने होंठ रख दिए। एक बिजली सी दौड़ गई मेरे शरीर में। लंड एकदम तन गया और पैंट से बाहर आने के लिए तड़पने लगा। उसने तुरंत आँखें खोली और अवाक सी मुझे देखती रही। और दोस्तों कस कर और शर्मा कर मेरी बाहों में आ गई। मेरी खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा। कस कर मैंने उसे अपनी बाहों में दबा लिया। ऐसा लग रहा था बस यही पकड़े रहूँ। फिर मैंने सोचा कि अब समय नहीं बर्बाद करना चाहिए। पका हुआ फल है, बस खा लो। तुरंत बाहों में मैंने उसे उठाया (बहुत ही हल्की थी) और बेडरूम में लाकर बिस्तर पर लिटाया। उसने आँखें बंद कर रखी थीं। बहुत शर्मा रही थी बेचारी। साड़ी पहने हुए बिस्तर पर लेती हुई शर्मीली हुई आँखें बंद किए हुए ब्लाउज से स्तन ऊपर नीचे होते हुए देखकर मैं पागल हो गया। आहिस्ते से साड़ी को एक तरफ कर मैंने उसकी दाहिनी चूची को ऊपर से ही दबाया। एक सिहरन सी दौर गई उसके शरीर में। बंद आँखों से ही बोली, “प्लीज़ विजय साहब, जल्दी से ! कोई आ नहीं जाए।”

“घबराओ नहीं, प्रतिमा डार्लिंग। बस मज़ा लेती रहो। आज मैं तुम्हें दिखला दूंगा प्यार किसे कहते हैं। खूब चोदूंगा मेरी रानी।” मैं एकदम फॉर्म में था। यह कहते हुए मैंने उसकी चुचियाँ हो खूब दबाया और होठों को कस कस कर चूसने लगा। फिर मैंने कहा, "चुदवाओगी ना।" अहा, गजब की शर्मिंदगी हुई बोली, "विजय साहब, आप भी... बहुत पाजी हैं।" "प्रतिम रानी, ​​सेक्स में क्या शरमाना।" और उसके नरम नरम गालों को हाथ में ले कर होठों का खूब रसपान किया। मैं उसके ऊपर चढ़ा हुआ था और मेरा लंड उसकी चूत के ऊपर था। चूत मुझे महसूस हो रही थी। और उसकी चुचियाँ... गजब की तानी हुई... मेरे सीने में चुभ चुभ कर बहुत ही आनंद दे रही थी। दाहिने हाथ से अब मैंने उसकी बाईं चूची को खूब दबाया और एक्साइटमेंट में ब्लाउज के नीचे 

हाथ घुसा कर उसे पकड़ना चाहा। "विजय, ब्लाउज खोल दो ना।" उसका यह कहना था और मैंने तुरंत उसे घुमा कर ब्लाउज के बटन खोले और साथ ही साथ ब्रा का हुक खोला और पीछे से ही हाथ को ब्रा के नीचे से उसके बूब्स का पूरा समेट लिया। अहा, क्या फीलिंग थी, शायद और नरम दोनों, गर्म पुरुषों में आग हो। निप्पल एकदम तने हुए। जल्दी जल्दी ब्लाउज और ब्रा को हटाया। साड़ी को पार किया और पेटीकोट के नारे को खोल कर उसे हटाया। गुलाबी पैंटी पहने हुए नंगी लेती हुई देख कर तो मैं बर्दाश्त ही नहीं कर सका। शर्मा कर उसने अपने बूब्स को चिपकाने की कोशिश की और टेंगॉन को क्रॉस कर के चूत को भी छिपाया। मैंने अब अपने कपड़े जल्दी जल्दी उतारे। लंड तन कर बाहर आ गया और ऊपर की तरफ होकर तड़पने लगा। उसका एक हाथ ले कर मैंने अपने फाड़ते हुए लंड पर रख दिया। “उफ कितना बड़ा और मोटा है”, वो बोली। और आहिस्ता आहिस्ता लंड को आगे पीछे हिलाने लगी। शादीशुदा औरत को चोदने का यहीं मज़ा है। कुछ सिखाना नहीं पड़ता। वो सब जानती हैं। और अगर महीने का ठीक दिन हो तो कंडोम की भी ज़रूरत नहीं। मैंने आखिर पूछ ही लिया, “प्रतिम डार्लिंग, कंडोम लगाऊँ?” मुँह हिलाते हुए मना करते हुए हँसते हुए खिलखिलाई, “सब ठीक है। अभी पीरियड्स हुआ ही था।” मैंने अब उसके बदन से उस गुलाबी पैंटी को हटाया और उल्टी से उसकी चूत को निहारा। हल्के हल्के बाल थे। बीच में सुंदर सा छोटा सा कट। कुछ फूला हुआ था। हाथ मैंने उसके ऊपर रखे और हल्के से दबाया। उंगली ऐसे घुसी जैसे मक्खन में चूड़ी। रस बह रहा था और चूत एकदम गीली थी। विवरण के बाहर है। मैं जैसा सब कुछ एक साथ कर रहा था। कभी उसके होठों को चूसता, चुचियों को दबाता कभी एक हाथ से कभी दोनों से। एकदम टाइट गोल और तनी हुई चुचियाँ। उसके सोने जैसे बदन पर कभी हाथ फिरता। फिर मैंने उसकी चुचियों को खूब चूसा और उंगलियों से उसकी बुर में खूब अंदर बाहर कर हिलाया। “प्रतिमा, अब मैं नहीं रह सकता, अब तो चोदना ही पड़ेगा। कस कस कर चोदूंगा मेरी रानी।” पहली बार उसके मुँह से अब सुना, “छोड़ दीजिए ना विजय साहब, बस छोड़ दीजिए।” मज़ा लेते हुए मैंने पूछा, “क्या छोड़ूँ जाने मन। एक बार फिर से कहो ना। तुम्हारे मुँह से सुनने में कितना अच्छा लग रहा है।”"अब छोड़िया ना… इस… इस चूत को।”"चूत नहीं, बुर मेरी रानी, ​​बुर। ज्यादा अच्छा लगता है सुनने में। अब मैं तेरी गरम गरम और गुलाबी गुलाबी बुर में अपना यह लंड घुसाऊंगा और कैसे कस कर चोदूंगा।” मैंने अपना लंड उसके बुर के मुँह पर रखा और हल्के से धक्का दिया। उसने अपने हाथों से मेरे लंड को पकड़ा, और गाइड करती हुई अपनी चूत में डाल दिया। दोस्तों मनुष्यों मैं जन्नत में आ गया। मैं बोल ही उठा, “उफ, क्या बुर है प्रतीत। मज़ा आ गया।” अब उसने भी एक्साइट होकर बगैर झिझके कहा, “छोड़ दो विजय बस अब इस बुर को खूब छोड़ो।” दोस्तों चूचियां दबाते हुए, होंठ चुसते हुए ज़ोर से ज़ोर चोद चोद कर ऐसा मज़ा मिल रहा था कि पता ही नहीं चला कब मैं झड़ गया। झड़ते झड़ते भी मैं उसे बस छोड़ता ही रहा चोदता ही रहा। “प्रतिमा, बहुत टेस्टी चुदाई थी यार। तुम तो गजब की चीज़ हो।” उसकी चूचियाँ मेरे सीने से लग कर एक अलग ही आनंद दे रही थी। दोस्तों, हमने फिर 20 मिनट बाद, पहले तो उसके बुर को चाटा और उसने मेरे लंड को चूसा हल्के हल्के। और फिर हमने कस कस कर चुदाई की। और इस बार झरने में काफी समय भी लगा। मैंने शायद उसकी चूचियाँ और बुर, होंठ और गाल के किसी भी अंग को चूसा बगैर नहीं छोड़ा। इतना मज़ा पहले कभी नहीं आया था। बस गजब की चीज़ थी वो। कपड़े पहनने के बाद मैंने उसे 500 रुपये दिए जो कि उसने न ना करते हुए शर्मीले हुए ले लिए। और मैंने पूछा, “प्रतीम, अब तो तुम्हें और कई बार छोड़ना पड़ेगा। अपनी इस प्यारी सी चूत और प्यारी प्यारी चूचियों और प्यारे प्यारे होठों और प्यारी प्यारी प्रतीम डार्लिंग के दर्शन करवाओगी ना?” मैंने उसका फ़ोन नंबर ले लिया और कह दिया कि मैं बता दूंगा जिस दिन कोई घर पर नहीं होगा। अब वो मुझसे फ़्री हो गई थी, बोली, “विजय, चिंता मत करो, होटल में चुद, चुद, जाएंगे।” चुमते हुए मैंने उसे भेजा।

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