मेरा नाम मनीषा है। मैं शादीशुदा हूँ। शादी के एक साल बाद की एक घटना मैं आज आपको बताती हूँ। मैं अपने पति के साथ रहती थी। घर में हम दो ही रहते थे। वैसे मैं बहुत सेक्सी हूँ लेकिन अपने पति से संतुष्ट थी। वो भी सेक्स में अच्छे हैं। हाँ, सेक्स भी हमेशा एक जैसा हो के रह गया था। एकडम रूटीन और मोनोटोनस लगता था। एक दिन एक पत्र पढ़कर वो बोले, मनीषा, मेरा एक चचेरा भाई जो करीबी के छोटे गाँव में रहता है, उसकी एसएससी की एग्जाम का सेंटर इस शहर में आया है। तो वो पढ़ने के लिए और एग्जाम देने के लिए इसी शहर में आ रहा है। कुछ दिन यहाँ रहे तो एट्राज़ तो नहीं है? मैंने कहा, भला मुझे क्या एट्राज़ होगा। आपका भाई है, तो मेरा तो देवर हुआ ना। देवर के आने से भाभी को क्या एट्राज़ हो सकता है। और वो आ गया। नरेश नाम था उसका। करीब 18 साल का होगा। 5-8 की ऊँचाई और मज़बूत कद था। मोटा नहीं पर कैसा हुआ बदन था। हल्की सी मुछें भी थीं। अब घर में बस्ती हो गई। सुबह का नाश्ता हम सब, मैं पति और नरेश, साथ करते थे। उनके ऑफिस जाने के बाद मैं घर में पहले अकेली हुई कराती थी। अब नरेश भी था। वो दिनभर मन लगाकर पढ़ाई करता था। मैं भी उसे ज्यादा डिस्टर्ब नहीं करती थी, उसे पढ़ाने देती थी। लेकिन लंच और दोपहर की चाय हूँ साथ पीते थे। दोपहर को जब मैं नींद से उठती तो उसके कमरे की और चली जाती और पूछती; पढ़ाई कैसी हो रही है? वो कहता ठीक हो रही है। और मैं पूछती; चाय पियोगे ना? वो कहता है, हाँ। और फिर मैं चाय बनाने चली जाती। चाय पीते समय हम दोनों बात करते थे। लेकिन उस रोज़ जब मैं दोपहर की नींद के जल्दी ही पूरी हो गई। जब मैं उसके कमरे पर गई, तो दरवाज़ा बंद था और कमरे से कुछ आवाज़ आ रही थी। मैं रुक गई और सुनने लगी। आह आह की आवाज़ आ रही थी। मुझे समझ में नहीं आया क्या हो रहा है। मैं दरवाज़ा खटखटाने वाली थी कि ख्याल आया, खिड़की से देख लूं। उस कमरे की एक खिड़की हॉल में पड़ती थी। वह भी बंद थी, पर पूरी लगी नहीं थी। मैंने हल्का सा धक्का दिया और थोड़ी सी खोल दी। कमरे का नज़ारा देखा तो बस, देखती ही रह गई। नरेश अपने सारे कपड़े उतारकर बिल्कुल नंगा खड़ा था। उसका लंड पूरा ताना हुआ था। वो लंड हाथ में लिए हुआ था और ज़ोर ज़ोर से उसे खेल रहा था। मेरी आँखें झपकना भूल गई, सीने की धड़कन बढ़ गई। मेरे सामने एक 18 साल का जवान लड़का अपने हाथ में ताना हुआ लंड लेकर हस्तमैथुन कर रहा था। मैंने मर्दों के हस्तमैथुन के बारे में सुन रखा था, लेकिन आज मैं उसे अपनी आँखों से देख रही थी। ओह, क्या सीन था!!! पूरी जवानी में आया हुआ, कसरती बदन वाला नव-युवक मेरे सामने नंगा खड़ा था। उसका खुला सीना ही किसी लड़की को व्याकुल बनाने के लिए काफी था। यहाँ तो उसकी शुद्ध जांघे भी नज़र के सामने थी। क्या मांसल जांघें हैं !! वाह !! और उसके बीच में पूर ज़ोर से उठा उसका लंड !!!!! हे भगवान !!! मेरे सीने की धड़कने तेज़ हो गई। मेरे संस्कार कह रहे थे, मुझे तुरंत वहाँ से हट जाना चाहिए। लेकिन मान नहीं मानता था। मैं रुक ही गई और वो दिलकश नज़ारा देखती रही। खिड़की थोड़ी ही खुली थी, इसके लिए उसका ध्यान नहीं था। वो तो अपने काम में मगन था और लगा हुआ था। उसका चेहरा भी देखने जैसा बना हुआ था। सेक्स की तड़प स्पष्ट रूप से छलक रही थी। उसका लंड और मोटा और कड़क होते जा रहा था। थोड़ी देर में उसके लंड से पानी छूट गया और वो ढीला हो गया। मैं वहां से चली गई तो मुझे ख्याल आया, मेरी पैंटी भी गीली हो चुकी थी। मैंने जा के बदल ली। वो नज़ारा मेरे दिमाग से उतरता ही नहीं था। रात को पतिदेव के साथ सोने गई तब भी दिमाग में यही मंदरा रहा था। उस रात मैं बहुत गरम हो गई और पति के ऊपर हो गई। मैं उसके ऊपर किसी भी चीज की तरह सवार हो गया। बाद में उनसे भी बहुत चुदवाया। वो भी बोल उठे, आज तुझे क्या हुआ है ? कोई ब्लू फिल्म तो नहीं देखी ? मैं क्या बोलूं ??? इस से बड़ी ब्लू फिल्म क्या देखती है ??? मैंने कह दिया, नहीं, यह तो आप कल से 10 दिन की टूर पर जाने वाले हैं ना, इसके लिए। वो हंस पड़े। दूसरे दिन भोर में ही वो टूर पर निकल गए। मेरा जी तो अब नरेश में अटका हुआ था। मेरा बदन उससे चुदवाने के लिए बड़ा तड़प रहा था। लेकिन उसे कहू भी कैसे? उसमें खतरा था। वो सुशील लड़का था। मुझे ठुकरा देगा और मेरी इज्जत पर खतरा हो जाएगा। तो मैंने सोचा, ऐसा कुछ करना होगा जिससे वो ही मुझे चोदने के लिए तरस जाए। मैंने धीरज से काम लेना उचित समझा। मैं स्नान करके निकाली तो मेरे दिमाग में योजना बन चुकी थी। मैंने अपने कपड़े में परिवर्तन शुरू किया। एक लो कट वाली मेरी पुरानी शादी के समय की ब्लाउज निकाली। उस समय की अपेक्षा, अब मेरे बूब्स बड़े हो चुके थे। (रोज पतिदेव द्वारा मसाले जो जाते थे!) जैसे तैसे करके बूब्स को दबा कर मैंने वो ब्लाउज पहन लिया। लो कट थी तो मेरा क्लीवेज पूरा दिखता था और बूब्स दबाके डालने से वो भी उबर कर बाहर दिख रहे थे। सारी भी इस तरह पहनती थी कि ये सारा खुला ही रहे, आँचल के पीछे ना छिप जाए। मैना आने में अपने आपको देखा और संतुष्ट हुई। नाश्ते की तैयारी की। डाइनिंग टेबल पर सब चीज़ प्लानिंग से रखी। नरेश को बुला लिया नाश्ते के लिए। वो आ के बाथा लेकिन उसका ध्यान नहीं गया। वो तो अपनी पढ़ाई के ख्यालों में ही था। मैंने सब आइटम थोड़ी ही दी थी। उतना तो ज़ट से खा गया और और माँग लिया। अब मैं मन ही मन मुस्कुराई अपने प्लान पर और उठ खड़ी हुई। उस परोसन के लिए उसकी नज़दीकी गई। मैं उसके दाईं ओर थी और सारी चीज़ें उसके बाईं ओर थी। तो मैं वही खड़े होकर आगे झुक कर चीज़ें उठाने लगी। स्वाभाविक है, मेरे बूब्स उसके मुँह के एकदम नज़दीक आ गए। अब उसकी नज़र उन पर पड़ी, और वो देखते ही रह गया। उभरे हुए गोरे गोरे बूब्स…और लो कट से दिखता पूरा क्लीवेज…उसकी नज़र चिपकी ही रह गई। मैं ऐसे व्यवहार कर रही थी जैसे मुझे पता ही नहीं। मैंने एक लंबी साँस भरी और हल्के से छोड़ी। छाती भर आई तो बूब्स की मूवमेंट भी हुई। उसे ध्यान ही नहीं रहा कि मैंने उसकी प्लेट परोस दी है। मैंने उसे कहाँ, देवरजी, नाश्ता कीजिए ना? वो चौंका और नज़र हटा के खाने लगा। लेकिन मेरी नज़र उस पर लगी हुई थी। वो बार-बार मेरे स्टैन को देख रहा था। मैं अपने प्लान में सफल रही। मैंने उसके शरीर में बीज बो दिया था। दूसरे दिन से मैं रोज़ अपने कपड़े में एक कदम आगे जाने लगी। दूसरे दिन मैंने ऐसा ही लो कट मगर स्लीवलेस ब्लाउज पहन लिया। अब उसे मेरी गोरी बहन भी देखने को मिलती थी। तीसरे दिन मैंने एकदम पारदर्शी ब्लाउज पहन लिया, जिससे मेरी काली ब्रा साफ दिखाई देती थी। अब वो रोज़ चोरी छुपी मेरे स्टेन को देखता था। चौथे दिन मैंने ब्रा पहन ही छोड़ दिया। ब्लाउज तो परदर्शक स्लीवलेस और लो कट था ही। उस रात को मैंने ब्लाउज को साइड से भी शेप दे कर ऐसा बना दिया कि क्लीवेज के अलावा बूब्स की साइड्स के भी दर्शन होने लगे। पांचवें दिन उसे पहनना। अब जब मैं उसे परोसती थी, तो दूसरी और रखी हुई आइटम्स उठाने के लिए इतनी झुकती थी कि उसकी गर्म सांस मेरे स्टेन को छूटी थी। कभी कभी तो उसका चाहा मेरे बूब्स को छू जाए, इतना झुक लेती थी। अब उसकी आँखों में तरस नाज़े आती थी। मैं जानती थी कि मैं कामयाब हो रही हूँ। छठे दिन मैंने साड़ी भी एकदम नीचे पहन ली। मैं अच्छी तरह से तैयार भी हुई। रोज़ की तरह वो मेरे उभरे हुए दोनों स्तनों को देखता रहा। मैं उन्हें लंबी सांस लेकर ऊपर नीचे कराती रही। मैंने ब्लाउज का हुक ढीला कर रखा था, जो थोड़ी सांस लेने के बाद टूट गया। मेरे दबे हुए स्तन उछल कर सामने आ गए। मैंने शरमाने का धोंग किया और अपने कमरे में जा के हुक को ठीक तरह से लगाकर वापस आ गई। उसकी हालत तो देखने जैसी हो गई थी। उसी दिन दोपहर को मैं हॉल में ही सो गई। एक नवलकथा की किताब मैंने ला के रखी थी जो देवर भाभी के नाजायज़ संबंध पर थी। उसमें जहाँ दोनों के सेक्स संबंध का खुल्ला ब्यौरा था, वहाँ तक पेज खोलकर उल्टी कर के रख दी। जैसे मैं वहाँ तक पढ़ते हुए, सो गई हूँ। सोने का धोंग करते मैं लेती थी। सारे घुटनों तक सिरका के रखी थी। रोज़ की चाय का समय हुआ, लेकिन मैं जान बुझा कर नहीं उठी। थोड़ी देर इंतज़ार करके, नरेश चाय के लिए बताने बाहर आया। उसने आके देखा कि मैं सोई हुई हूँ। वह करीबी आया और किताब उठाई। जैसे पढ़ने लगा, वह कमाई होने लगा। उस किताब में देवर भाभी के बीच सेक्स का ही खुला खुला ब्यौरा था। उसकी वासना भड़क उठी। उठाने में मैंने करवट बदलने का बहाना किया। बदलते बदलते मैंने मेरा बयान (बाएं) पैर भी घुटनों से ऊंचा किया। साड़ी जो घुटनों तक थी, अब कमर तक गिर पड़ी। मेरी गोरी जांघ (जांघ) अब पूरी तरह दिख रही थी। मैंने हल्की सी आँख खोली। तो देखा कि उसका लंड एकदम खड़ा हो गया था। उसने चड्डी (शॉर्ट्स) पहन रखी थी। एक हाथ में किताब पकड़ा हुआ था। दूसरा हाथ अब उसने अपनी चड्डी में नीचे से डाल दिया और खड़े लंड को मज़बूती से पकड़ लिया। थोड़ी देर पढ़ता रहा और मेरी जांघ और बूब्स की और देखता रहा। फिर मैंने देखा कि उसने अपना दूसरा हाथ बाहर निकाल के मेरी और बढ़ाया। मैं खुश हो गई और आँखें बांधकर इंतज़ार करने लगी। लेकिन कुछ नहीं हुआ। फिर आँखें खोली तो वो वहाँ नहीं था। उसकी हिम्मत नहीं बनी। वो कमरे पर चला गया था। हाँ, किताब आवश्यकता ले गया था। मैं उठी और उसके कमरे की और गई। वो दरवाजा बंद करके फिर हस्त मैथुन कर रहा था। आज तो घोड़े जैसा लंड किया हुआ था। मुझे बहुत अफसोस हो रहा था। जिसे मेरी चूत में होना चाहिए था, वो लंड उसके हाथों में था। लेकिन मुझे भी तो खुला नहीं होना था। मजबूरी में उसे देखती रही। थोड़ी देर में उसके लंड से फव्वारा उड़ा और वो शांत हुआ। उस रात मैंने सातवे दिन का प्लान बना लिया। उसके दिल में वासना तो मैं जगह ही चुकी थी। अब तो हिम्मत करवाना ही बाकी था। सातवे दिन सुबह मैंने अपने कमरे का फ्यूज निकाल दिया। और गीजर खराब है कहाँ के उसके अटैच्ड बाथरूम में नहाने का प्लान बना लिया। मैं कपड़े ले के अंदर चली गई। थोड़ी देर नहाके बाहर निकली, तो बदन पर सिर्फ तौलिया लपेटा था। ऊपर मेरी निप्पल से शुरू करके चूत तक तौलिये से बदन ढका था। निप्पल से ऊपर के स्तन का भाग और चूत के नीचे की टंगे सब खुली थी। सिर के बाल गिले थे और मेरे गोरे बदन पर पानी सरक रहा था। मैं काफी सेक्सी लग रही होगी। गरमी बहुत थी तो वो सिर्फ चड्डी पहन के पंखे के नीचे खड़ा था। मुझे देखा तो बस देखता ही रह गया। इतना नंगा मुझे उसने आज ही देखा। मैं उधर ही खड़ी रही। वो भी सारी शर्म छोड़ कर मुझे देख रहा था। मैंने उसकी बिस्तर पर वो किताब पढ़ी देखी, तो पूछ लिया; कैसी लगी ये कहानी? उसने कहा, बड़ी रोचक है… पर ऐसा तो कहानियों में ही होता है ना। मैंने कहा, कहानियाँ भी तो समाज से मिलती हैं ना… और महेश ने हिम्मत की तो हंसा को पाया। (महेश और हंसा उस किताब में देवर भाभी के नाम थे)। आखिर शुरू तो मर्द को ही करनी पड़ती है। हंसा की भी वही इच्छा थी, पर महेश ने शुरू किया तो उसने साथ दिया ना। वो बात को समझा…और करीबी आया। मैं समझ गई, अब मेरा काम हो गया। करीबी आके उसने अपने दोनों हाथ उठाए और मेरे फैले हुए गिले बालों में पसरते हुए हाथों को दोनों कान पर रखा। और मेरा चाहरा ऊँचा किया। मैं भी वासना भरी नज़र से उसको देख रही। वो जुआ और मेरे होठों पर अपने होंठ रख दिए। मैं रोमंचित हो उठी। मैंने उसे अपने होठों को चुराने दिया। कोई विरोध नहीं किया। उसकी हिम्मत बढ़ी और मुझे करीब खींचा। मैं भी उसके करीबी सरकी, लेकिन सरकने से पहले एक हाथ से सफाई से तौलिया खोल डाला। खुलते ही तौलिया गिर पड़ा। अब मैं पूरी नंगी थी और वो सिर्फ चड्डी पहने हुए थे। मैं करीबी जाकर उसको चिपक गई। उसने किस थोड़ी तेज़ की, लेकिन नया था तो बराबर आता नहीं था। इस लिए अब मैंने भी काम शुरू किया। अपने होंठ और जीभ से उसे जवाब दिया। वो सीखने में तेज़ था। तुरंत समझ लिया और दोनों एक लंबी अच्छी किस में खो गए। होंठ से होंठ और जीभ से जीभ मिल गए। हम रस पान करते रहे। मैंने अपनी बांहें उसके गले में डाल दी थी। उसकी बहन मेरी पीठ पर फिर रही थी। मैंने उसे कहा, दोनों हाथों को सिर्फ यूँ ही मत फिराओ, उनसे मुझे तुम्हारी और दबाओ। उसने ज़ोर बढ़ाया। अब मेरे स्टेन और निपल्स उसके सीने से चिपक गए। उसे भी मज़ा आया और उसने ज़ोर बढ़ा दिया। मैं दब जाने लगी। उसे भी आनंद आने लगा। मैं बोल उठी, मुझे क्रश कर दो नरेश, मुझे क्रश कर दो। उसने एकदम ज़ोर बढ़ा दिया…. आह.. क्रश ही कर दिया मुझे। मेरे स्तन तो उसके सीने से दबके मानो चौपट ही हो गए। निप्पल भी अब पिंच कर रही थी। लेकिन बड़ा मज़ा आ रहा था….. आहाहाआआ…. वैसे भी मुझे ये बहुत पसंद है। किसी मर्द की बाहों में क्रश हो के चूर चूर होने का नशा तो कोई औरत ही समझ सके। वो मुझे पिसता रहा, और होंठ चूसता रहा। फिर थोड़ी पकड़ ढीली करके वो होठों को छोड़ के नीचे उतारने लगा। मेरी ठुड्डी पर, फिर गर्दन पर, फिर कंधों पर किस करने लगा। अब उसे कुछ सिखाने की ज़रूरत नहीं थी। उसके अंदर का मर्द जाग उठा था और वो अपना काम जानता था। वो नीचे उतारा और मेरे बेटों को किस करना शुरू किया। वो सहलाता था, दबाता था, मसलता था, खेलता था, चूसता था, निपल्स को मरोड़ता था, और अंत में एक निप्पल मुँह में ले के ज़ोर से चूसने लगा और दूसरे स्टेन को बुरी तरह से मसलने लगा…आउच…मुझे दर्द होने लगा और मैंने दर्द की सिसकारियां भी मारी। लेकिन वो अब कहाँ कुछ सुनाने वाला था। रुको तो भी रुके नहीं। बड़ी बेरहमी से उसने मेरे दोनों बूब्स मसल डालें… आहाहाहाहाआआआआ… मेरे अंग अंग में आग लग गई।!!!!!! बदन गरम हो उठा और उसे चाहने लगा। अब वो किस करते हुए और नीचे उतारने लगा, पर हाथ तो बूब्स पर ही टीका रखे थे। मेरी कमर पर किस करते हुए, जांघों को छूटे हुए, वो मेरी चूत के पास जा पहुंचा। वहां जा के थोड़ा उल्ज़ा और रुका। उसके लिए ये नई चीज़ थी। मैंने प्यार से उसके सर पर हाथ फिराया, अपनी टांगे फैलाई और उसके सर को पकड़कर उसके होंठ को मेरी चूत पर जा ठहाराया। वो किस करने लगा… थोड़ी देर किस की तो मैंने इशारा किया और हम दोनों बिस्तर पर चले गए। अब मैं टांगे पूरी फैला सकी। वो फिर चूत पर गया। मैंने उसे कहा, जीभ से काम लो, होंठ से नहीं। इतना इशारा काफी था। वो शुरू हो गया। मेरी चूत चाटने लगा। मैंने अपने हाथ से मेरे पुसी लिप्स थोड़े फैले के उसकी जीभ अंदर डलवाई। वो सीख गया और उसने मेरे हाथ हटाए और बगडोर फिर संभाल ली। अब वो चूत के अंदर बड़ी सफाई से चाटे जा रहा था। मैं तो पहले ही गरम हो चुकी थी, अब पूरी तरह हो गई। मेरा बदन अब उसके लिए तड़पता था। मुझे उसका लंड चाहिए था, चूत के अंदर। …एक करंट सा उठ रहा था बदन में..मैंने एक कड़क अंगड़ाई ली और उसका मुँह वहाँ से हटाया। उसे अब मेरी बारी है। और मैं जो अब तक लेती थी, उठ बैठी और उसकी चड्डी उतारी। और वाह…..उसका पूरे कद का लंड स्प्रिंग की माफिक बाहर उछल आया……मैंने उसे जड़ों के पास से किस करना शुरू किया, फिर चारों और से किस किया। फिर उसके सिर के पास पहुंचती है। तब दोनों हथेलियों के बीच उसके लंड को ले के उसे रगड़ डाला, जैसे हम लस्सी बनाते समय घूमते हैं। इसका लंड एकदम जल्दी से तैयार हो जाता है……और मुझे भी तो अब चुदाने की जल्दी लगी हुई थी। (नहीं तो मैं आराम से उसका लंड चूसती रहती है) उसका लंड और बड़ा हो गया। मैंने ऊपर की चमड़ी हटाई और उसके गुलाबी सिर को मुँह में ले लिया। थोड़ी देर चूसा और देखा कि इसे कोई ब्लोजॉब की जरूरत नहीं है, तो उस नीचे चूत की और ढकेल दिया। मैं वापस लेट गई। उसे मेरे ऊपर खींच लिया। मैंने पैर चौड़े किए और उसका लंड मेरी चूत पर रख दिया। उसने एक धक्का मारा और लंड अंदर चला गया। आह!!!! इसी के लिए तो यह सारा खेल था… उसने चोदना शुरू किया। लंड काफी बड़ा और गरम था। मैं अंदर कुछ अलग ही महसूस कर रही थी… दर्द भी हो रहा था और मज़ा भी आ रहा था। उसकी स्पीड बढ़ी। मैं चिल्लाने लगी, नरेश आज बुरी तरह चोद मुझे, फाड़ डाल इस रंडी चूत को। छोड़ नरेश छोड़। मेरे मुँह से ऐसे शब्द सुन के वो तज़्ज़ूब हो गया, पर फिर मुस्कुराया और बोला, गभराओ मत, आज नहीं छोड़ूंगा, एक हफ़्ते से मेरी नींद हराम कर रखी है, आज तो चूत फाड़ कर ही रहूंगा। और फिर वो चोदता रहा, चोदता रहा, और चोदता ही रहा। बड़े ज़ोर से चोदा। दो नों को बड़ा मज़ा आया और चुदाई के बाद थक के लेट गए। उसके बाद तो तीन दिन और थे हमारे पास। और अब तो पटाने की बात नहीं थी। हमने सारा समय साथ ही गुजारा। न जाने कितनी बार उसने मुझे छोड़ा। खत्म






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